जीवन जीने की 3 कलाएं हैं, जोकि प्रकर्ति के अंदर उपस्थित 3 गुणों पर आधारित हैं

Art of living अर्थात जीवन जीने की 3 कलाएं, प्रकर्ति मैं उपस्थित 3 गुणों पर आधारित हैं, व्यक्ति अपनी इन्द्रियों ( Sences ) से, जिस प्रकार के स्वाद की, अधिक मात्रा मैं, अनुभूति करता है, पसंद करता, आकर्षित होता है, आकर्षणवश उन्हें दोहराता है, वही गुण उस व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करते हैं, यहाँ समझने वाली बात ये हैं, कि आप अपने बच्चे को, जिस माहौल मैं ढालेंगे, जिस प्रकार के गुणों की, पुनरावृत्ति करवाएंगे, वही गुण आपके बच्चे का चरित्र बन जायेंगे, बिना घुमाये फिराए अगर कहें, तो साधारण शंब्दों मैं यही art of living प्रत्येक व्यक्ति के कर्म और उसका भविष्य निर्धारित करती है

प्रकर्ति के 3 गुण

विज्ञान मैं जिस तरह प्रत्येक पदार्थ मैं 3 गुण बताये जाते हैं, उसी प्रकार, अध्यात्म मैं, प्रकर्ति के 3 गुणों का बोध करवाया जाता है, इन तीनों गुणों मैं से, व्यक्ति जिस गुण के तरफ अत्यधिक आकर्षित होता है, जिसपर अमल करता है, स्वयं को उसी मैं ढाल पाने मैं, सक्षम होता है,

गुण शब्द का प्रयोग किसी एक वस्तु या पदार्थ का प्रारूप न होकर, उस गुण को धारण करने वाले, अनेकों पदार्थों की, एक साथ प्रतीति होना है, जैसे मीठा कह देने से, अनेकों प्रकार की मिठाइयों की, प्रतीति होती है, न कि केवल शक्कर की, अर्थात मिठास ही गुण है, इस प्रकार गुण का अर्थ उस पदार्थ का स्वभाव होता है
परन्तु सांख्यकी मैं, इन त्रिगुणों का मतलब, पदार्थ की गुणवत्ता या स्वभाव नहीं अपितु, यहाँ ये त्रिगुण प्रकृति के आवश्यक घटक हैं
सत्व, रजस् और तमस् नाम के तीनों घटक प्रकृति और, इसमें उपस्थित के प्रत्येक अंश में विद्यमान रहते हैं, इन त्रिगुणों के बिना किसी वास्तविक पदार्थ का अस्तित्व ही संभव नहीं, किसी भी पदार्थ में इन तीन गुणों के न्यूनतम या अधिकतम प्रभाव के कारण ही, उस का चरित्र निर्धारित होता है।

तमस

पहला गुण है, तमस

तमस का अर्थ है, तामसिक जीवन, अर्थात ऐसा गुण जिनमें, बिना शोध या विचार किये, पुरानी परम्पराओं कोनिभाने की चाह होती है, ऐसा व्यक्ति अपने जीवन मैं, कोई नयी वस्तु या विचार को, जगह नहीं देता है, पुरानी परम्पराओं से होने वाले नुकसान या फायदों को बगैर जांचे, उन्हें निभाते रहता है, जबकि परम्पराएं भी देश और काल के हिसाब से, बदल देनी चाहिए, कोई परंपरा जो आज प्रचलन मैं है, लाभ दे रही है, जरुरी नहीं कि 100 बर्ष बाद भी लाभ दे,
ऐसे व्यक्ति अत्यंत बहुत जल्द, ढोंगी बाबाओं की भेषभूषा मात्र को देखकर, उनके बतायीं गई बातों को Follow करने लगते हैं, होते तो अंधविश्वासी बन जाते हैं, पर स्वयं को अत्यंत आस्तिक समझते हैं, ऐसे लोग भगवान को जाने बिना, उसकी अराधना मात्र इस संशय से करते हैं, कि भगवान् कहीं क्रोधित होकर, हमारा अहित न कर दे, ऐसे लोग अपने इस डर के कारण, कभी धार्मिक बातों पर शोध नहीं करते, ये अत्यंत विश्वासी होते हैं, जबकि विश्वास का अर्थ ही झूठ है, ऐसी बात जो हमारी कल्पनाओं मैं है, उसे अपनी कल्पनाओं मैं ही, सच का जामा पहना दिया जाए उसे विश्वास कहते हैं, इसलिए “ढोंगी बाबा” बार बार, ऐसे लोगों का विश्वास का विश्वास तोड़ पाने मैं सफल होते हैं, ऐसे व्यक्ति कर्म से ज्यादा, फल की आशाएं रखते हैं, ये लोग जप / तप / नियम / संयम / भक्ति आदि भावों का, बिना अर्थ जाने, बहुत गहराई से पालन करते हैं

रजस

दूसरा गुण है, रजस

रजस का अर्थ, राजसिक, अर्थात ऐसे व्यक्ति जोकि राजसिक मनुष्य की तरह जीवन व्यतीत करते हैं, ऐसे लोग सिर्फ अपनी इक्षाओं की आपूर्ति हेतु, जीवन व्यतीत करते हैं, रजस एक संस्कृत शब्द है, जिसका हिंदी मैं अर्थ होता गतिशीलता, ये गतिशीलता यदि निर्जीव वस्तु मैं है, तो विकास का प्रारूप है, परन्तु गतिशीलता यदि सजीव मैं है तो, अंत की ओर ले जाती है, उसी प्रकार कम समय मैं अधिक पाने की इक्षा, अंत की सूचक है, ऐसे लोग अच्छाई – बुराई का भेद भी, अच्छी तरह जानते हैं, परन्तु स्वार्थवश वे अच्छाई का साथ देने मैं, स्वयं को सक्षम नहीं मानते, ऐसे लोग धूम्रपान, शराब, तम्बाकू या अन्य विषैले पदार्थों का सेवन करने के आदती होते हैं, इनमें छिपे रूप मैं, लोभः / मोह / क्रोधः / अहंकार जैसे दूषित गुण होते हैं, ये लोग जीभ के लोलुप होते हैं, ऐसे लोगों को स्वादु भी कहा जाता है, अपनी इक्षाओं की आपूर्ति करने के लिए , ये किसी भी प्रकार के अधर्म करने से नहीं कतराते

सत्व

तीसरा गुण है, सत्व

तीसरा गुण है, सत्व, अर्थात सत्य, जिस का सार है, पवित्रता, शुद्धता, सुंदरता और सूक्ष्मता, सत्व का संबंध चमक, प्रसन्नता, भारन्यूनता और उच्चता से भी है, सत्व बुद्धि से जुड़ा है, सत्व का सम्बन्ध डाइरेक्ट चेतना से होता है, ये व्यक्ति स्वार्थ और परम्परावादी विचारधारा से दूर, मौजूदा स्थति का ठीक से अवलोकन करने बाद, पुरषार्थी निर्णय लेते हैं, ऐसे मनुष्य लोभ / मोह / अहंकार जैसे सभी द्वेषों से दूर रहते हैं

विश्लेषण

वास्तविकता की अंत्येष्टि

जैसे बिना रोग जाने, औषधि का पान करने से, कोई औषधि लाभ नहीं देती, उसी प्रकार अंधविश्वासी की आस्था कभी सफल नहीं होती, ठीक वैसे ही, ये तीनों घटक की पहचान किये बिना, जीवन जीना व्यक्ति का द्रढ़ चरित्र बन जाता है, परन्तु यदि इन तीनों घटकों को जानकर / इन्हें समझकर जीवन जिया जाए, तो व्यक्ति अपने अपने जीवन मैं, अत्यंत सुख और सम्मान का जीवन व्यतीत कर सकते हैं, ऐसी स्थति मैं, ये तीनों घटक जीवन जीने की, 3 परिपक़्व कलाओं के रूप मैं, प्रदर्शित होंगी,
तमस गुण द्वारा, ऐसे व्यक्ति संसार की बुराइयों को अनदेखा कर सकते हैं, रजस गुण के कारण विकास की गति बनी रहेगी और सत्व गुण के कारण स्वार्थी विचारों से दूरी एवं सत्य के प्रति निष्ठा बढ़ेगी, जीने की यही 3 कलाएं ( 3 Art of living ) हैं

ध्यान दें – इस लेख का, Art of living, श्री श्री रविशंकर द्वारा चलाई जा रही, संस्था से कोई सम्बन्ध नहीं है, यदि आप श्री श्री रविशंकर जी की, Art of living संस्था के बारे मैं जानना चाहते हैं, तो नीचे दिए बटन पर क्लिक करें

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