सावधान : कैसे Deepawali जैसे, बड़े त्योहारों पर भी हो रहा है, सनातन संस्कृति का पतन, और क्या है इसका महत्त्व ?

Deepawali का त्यौहार, सनातन संस्कृति मैं, सबसे बड़ा और सबसे प्रमुख त्यौहार माना जाता है, परन्तु परम्परावादी विचारधारा चलते, सैकड़ों बर्ष पश्चात, हर बार ऐसा समय अवश्य आता है, जिसमें लोग किसी परम्परा का मूलभूत अर्थ भूलकर, उस परम्परावादी विचारधारा को, द्रढ़ अवस्था मैं अपनाकर, उसे इस तरह निभाते हैं, जैसे उनपर कोई मानसिक दबाव बनाया जा रहा हो, वैसे सही मैं इन परम्पराओं को, मानसिक दबाब के तौर पर ही बनाया जाता है, लेकिन ऐसे मानसिक दवाबों का उद्देश्य होता है, कि व्यक्ति न सिर्फ इन्हें आजीवन निभाता रहे, बल्कि इन परम्पराओं से अभिभूत होकर, एक दिन व्यक्ति इन पर तर्क / शोध करे, और इन परम्पराओं के मूल महत्त्व को जाने, इसलिए मैंने शुरुआत मैं ही प्रश्न किया, कि क्या आप दीपावली का महत्त्व जानते हैं, मेरे हिसाब से सिर्फ 5 % लोग होंगे, जो दीपावली के इस त्यौहार का महत्त्व जानते होंगे, चलिए आज हम सभी, इस लेख के माध्यम से, दीपावली का महत्त्व जानते हैं

परन्तु खबरदार, नीचे के लेख को पढ़ने से पहले, या जानने से पहले, आप ये समझ लें, कि यदि आप परम्परावादी विचारधारा से ताल्लुक रखते हो, और आपमके दिमाग मैं, परिवर्तनशील विचारधारा के लिए कोई स्थान नहीं हैं, तो लेख को पढ़कर, अपना समय खराब न करें, क्योंकि अच्छी बातें या उपदेश भी, सिर्फ उन्हीं लोगों को फलित होते हैं, जो लोग संवेदनशील और धार्मिक होते हैं,

Deepawali की शुरुआत कहाँ से हुई ?

आजकल की रीतियों के अनुसार, 14 बर्ष के वनवास के बाद, जब भगवान् राम वापिस अपने धाम अयोध्या पहुंचे, इस ख़ुशी मैं लोग, Deepawali का त्यौहार, धूम धाम से मनाते हैं, इस बात पर कोई लम्बी चर्चा करके, मैं यहाँ आपका और अपना समय, खराब नहीं करना चाहता, क्योंकि इस बात को तो हम सभी जानते हैं, परन्तु हम यहाँ कुछ भिन्न एवं रोचक तथ्यों पर बात करेंगे, क्योंकि हमारे Logo मैं ही लिखा हुआ है, Dharmguru – Ahead Of Science, इसलिए सबसे पहले हम Deepawali का वैज्ञानिक प्रभाव समझेंगे

Deepawali का वैज्ञानिक महत्त्व

जैसा कि आप सभी जानते हैं, कि Deepawali महापर्व, कार्तिक मास की, कृष्ण पक्ष की, अमावस्या तिथि को मनाया जाता है, अँग्रेजी कैलंडर मैं ये पर्व अक्टूबर के अंत या नवंबर की शुरुआत मैं मनाया जाता है, क्योंकि सितम्बर माह तक बरसात ऋतु चलती है, और बरसात के बाद, घरों के कोनों मैं, नमी की वजह से, थोड़ी गन्दगी- जाले, कीट – पतंगे हो जाते हैं, ऐसे मैं घरों की सफाई डेंटिंग पेंटिंग करवाना भी अनिवार्य हो जाता है, इस कारण लोग Deepawali पर्व से पहले ही, घरों की डेंटिंग – पेन्टिंग साफ़ सफाई आदि करवाई जाती है, ये Deepawali पर्व मनाने का वैज्ञानिक महत्त्व है

क्या है, Deepawali पर्व का दूसरा महत्व ?

यहाँ हम आपको, Deepawali का, एक और महत्त्वपूर्ण पहलू बताने जा रहे हैं, जो आपके जीवन जीने के तरीके मैं, बिशेष बदलाव करेगा, तो इसे समझते हैं, पहले तो आप ये समझ लीजिये, कि आपके जी ते जी, आँखों के सामने, सनातन संस्कृति का, किस प्रकार पतन हो रहा

कैसे हो रहा है, Deepawali पर, सनातन संस्कृति का पतन ?

उदाहरण 1 – हमारे बच्चे Deepawali पर्व को धूम धाम से मनाने के लिए, जो पटाखे खरीद कर लाते हैं, हम स्वयं दिलवाते हैं, उन पटाखों के नाम, लक्ष्मी बम्ब , गणेश बम्ब, कभी हनुमान बम्ब आदि होते हैं, आपने गौर से देखा हो तो, इन पर हमारे आराध्यों की तस्वीरें भी छपी होती हैं, इन तस्वीरों मैं हम आग लगाते हैं,और सुबह इन जली – कटी तस्वीरों पर, पैर रखकर हैं, बाद मैं झाड़ू वाला, इन् तस्वीरों को , साधारण कूड़े की भांति इकठ्ठा कर, ले जाता है, यानी सेक्युलर बनने के साथ – साथ, हमने स्वयं अपने देवी देवताओं के अपमान भी, स्वीकारने शुरू कर दिए हैं

उदाहरण 2 – अभी 10 -15 बर्ष पहले तक, हम सनातनी लोग Deepawali पर, 3 आराध्यों की पूजा करते थे, जिनमें सरस्वती, लक्ष्मी और गणेश होते थे, परन्तु हमें पता ही नहीं पड़ा, कि शहरों के इस आधुनिकीकरण के कारण, अब हम सिर्फ 2 आराध्यों की पूजा करते हैं, सिर्फ लक्ष्मी और गणेश की, जबकि हमारा दूसरा महत्त्व, इन तीनों की पूजा, एक साथ करने से जुड़ा है, आईये समझें

जीवन मैं 3 बातें, और Deepawali के इस चित्र मैं दिए गए 3 आराध्य, जोकि जीवन मैं अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं, हम यहाँ बिलकुल चित्र की यथास्थिति के हिसाव से, वर्णन करेंगे

Deepawali पर्व का अर्थ
  • क्योंकि दुकानों पर या Google मैं, आपको ये चित्र देखने को ही नहीं मिलेगा, इसलिए इसका प्रिंट एकदम साफ़ नहीं है, ये चित्र आज से 15 – 20 बर्ष पहले तक प्रचलन मैं था, पर आज के मॉडर्न जमाने मैं नहीं
  • अब चित्र को ध्यान से देखें, चित्र मैं, सरस्वती बैठी हुई हैं, लक्ष्मी जी खड़ी हुई हैं, और गणेश जी बैठे हुए हैं
  • अब Deepawali के इस चित्र मैं उपस्थित आराध्यों को, प्रतीकात्मक द्रष्टि से देखकर, समझने का प्रयास करें,
  • सरस्वती माँ – ज्ञान का प्रतीक हैं
  • लक्ष्मी माता – धन का प्रतीक हैं
  • और भगवान् गणेश – यश का प्रतीक

क्यों होती है, Deepawali पर, सरस्वती माँ की पूजा ?

Deepawali पर्व का पहला आराध्य हैं सरस्वती माँ, जोकि ज्ञान का प्रतीक हैं, ज्ञान का अर्थ होता है जानकारी, परन्तु ज्ञान को जानकार भी, कोई व्यक्ति ज्ञानी के जैसा व्यवहार करे, ये जरुरी नहीं,
जो व्यक्ति अपने निजी स्वार्थ से दूर रहकर, अपने प्रत्येक ज्ञान का प्रयोग, लोगों की या समाज की भलाई के लिए करता है सिर्फ वही ज्ञानी है, “प्रत्येक ज्ञान”, मैंने इसलिए कहा कि संसार मैं, अच्छी और बुरी दोनों घटनाओं से ज्ञान प्राप्त किया जाता है, जरुरत पढ़ने पर सेवा भी ज्ञान है, और छल भी ज्ञान है, और जैसा हमने शुरुआत मैं कहा था, उस हिसाब से, जीवन की 3 सबसे बड़ी बात, जिसमें सबसे पहला और सबसे महत्त्व पूर्ण उद्देस्य होता है, ज्ञान प्राप्त करना

Deepawali पर, लक्ष्मी माता की पूजा क्यों होती है ?

जैसा कि Deepawali के सन्दर्भ मैं, शुरुआत मैं, बात की थी, जीवन की 3 सबसे बड़ी बातें, सबसे महत्त्वपूर्ण उद्धेस्य, जिसमें पहला उद्देश्य ज्ञान प्राप्त करना है, एवं दूसरा उद्देश्य है संपत्ति प्राप्त करना, यहाँ संपत्ति का अर्थ धन से नहीं है, अपितु यहाँ संपत्ति का अर्थ है, व्यवहारिक संपत्ति, वैचारिक संपत्ति, यदि आप भी अपने जीवन के महत्त्वपूर्ण पहलुओं पर द्रष्टि डालेंगे तो समझ जायेंगे, जो काम धन से नहीं होते, वो विनम्रता और व्यवहार से, तुरंत हो जाते हैं, धन भी संपत्ति का एक अपवाद है, परन्तु धन को सिर्फ संपत्ति समझना मूर्खता है, इसीलिए हम Deepawali पर संपत्ति की पूजा करते हैं

Deepawali पर, गणेश की पूजा का क्या अभिप्राय है ?

जैसा कि हम ऊपर के लेख मैं, जीवन के 3 महत्त्वपूर्ण उद्देश्यों की चर्चा कर चुके हैं, जिसमें पहला उद्देस्य, ज्ञान प्राप्त करना है, दूसरा उद्देश्य संपत्ति प्राप्त करना है, तीसरा उद्देश्य है, यश की प्राप्ति, भगवान् गणेश को यश – वैभव का देवता माना जाता है, ( गण + ईश = गणेश )जो गण यानी लोगों के,, ईश यानि ईश्वर माने जाते हैं, इस प्रकार इन तीनों महत्त्वों के समायोजन से, यानी ज्ञान, संपत्ति और वैभव से व्यक्ति का जीवन पूर्ण माना जाता है

तर्क – यदि आपके पास, ज्ञान है, पर संपत्ति या वैभव नहीं, तो ऐसा ज्ञान निराधार है, यदि ज्ञान और संपत्ति दोनों हैं, पर यश नहीं, कोई आपको जानता नहीं, तो ऐसा ज्ञान और संपत्ति का क्या फायदा, इसलिए जीवन मैं इन तीनों का होना ही अनिवार्य है, ये तीनों एक दूसरे के पूरक भी हैं, जैसे – जिसके पास ज्ञान होगा, उसके पास संपत्ति भी होगी, और जिसके पास ज्ञान और संपत्ति दोनों होंगे, उसका यश – वैभव तो अवश्य ही होगा

सरस्वती माँ

चित्र की भांति तीनों का किरदार भी जगजाहिर है, ज्ञान का निवास स्थिर है, जो व्यक्ति एक बार ज्ञान की अनुभूति कर लेता है, तो हमेशा हमेशा के लिए ज्ञानी बन जाता है, ऐसे व्यक्ति का चरित्र स्थिर हो जाता हैं, क्योंकि वो हमेशा अपनी परिस्थिति मैं और अपने आप मैं अंतर महसूस करना सीख जाता है, ऐसा ज्ञानी व्यक्ति खराब समय आने पर भी, अपने चरित्र को खराब नहीं करता, इसलिए यहाँ सरस्वती माँ को बैठा हुआ दिखाया गया है

लक्ष्मी माँ

संपत्ति का प्रतीक यानि लक्ष्मी माता, के खड़े होने से सीख मिलती है, कि व्यवहार, विचार, या धन, ये स्थिर नहीं, ये कभी कम कभी ज्यादा या, आते जाते रहते हैं,

भगवान् गणेश

वैभव यदि व्यक्ति का ज्ञान स्थिर है, तो यश – वैभव भी स्थिर रहेगा, आपकी संपत्ति मैं, घटत – बढ़त होती रहे, परन्तु आपके यश – वैभव मैं, कोई कमी नहीं आएगी, इसलिए भगवान् गणेश को बैठा हुआ दिखाया जाता है, एक बार हम पहले भी Clear कर चुके हैं, लोभी व्यक्ति धन को ही अपना धर्म – ईमान और उद्देश्य मानते है, ऐसे लोगों के सामने अपनी अच्छाई व्यक्त करना, अपना समय और Energy दोनों खराब करना है

Deepawali का तीसरा महत्त्व

जहाँ तक लोग जानते हैं, कि Deepawali का त्यौहार, वनवास के बाद, भगवान् राम के अयोध्या लौटने की ख़ुशी मैं मनाया जाता है, परन्तु कई अन्य धार्मिक कथाओं के अनुसार, ये एक मात्र संयोग है, कि कार्तिक माह के कृष्ण नक्षत्र मैं, अमावस्या के दिन, जिस दिन Deepawali के मनाई जाती है, इसी दिन भगवान् राम का, अयोध्या मैं वापिस आना हुआ, परन्तु दीपावली का त्यौहार, उससे पहले भी मनाया जाता था, जी हाँ, रामजन्म से हजारों बर्ष पहले, भक्त प्रहलाद जिनके उपलक्ष मैं, होली पर्व मनाया जाता है, कहते हैं, Deepawali की शुरुआत भी उन्ही के द्वारा की गई थी,

आपको होली के त्यौहार की कहानी तो पता ही होगी, जोकि भक्त प्रह्लाद के बाल्यपन से प्रेरित है, जिसमें भक्त प्रह्लाद की बुआ ने, उन्हें आग मैं जलाने का प्रयास किया, इस घटना मैं वो खुद जल गई और भक्त प्रह्लाद बच गए, संक्षिप्त मैं इस कहानी को पढ़ने के लिए, नीचे बटन पर क्लिक करें

आखिर Deepawali किसका नाम था ?

अब भक्त प्रह्लाद की व्यस्क अवस्था की बात करते हैं, बड़े होने पर भक्त प्रह्लाद का विवाह, धृति नामक स्त्री से हुआ, और विरोचन नामक पुत्र की प्राप्ति हुई, विरोचन अपने पिता के समान ही, शक्तिशाली तथा दानवीर स्वभाव के थे, एक दिन जंगल मैं भ्रमण के दौरान, युवराज विरोचन की मित्रता, एक साधू से हो गई , ये साधू कोई और नहीं, ऋषि अंगिरा के पुत्र, सुधनवा ही थे, इसी वन मैं, ऋषि वत्स अपनी पुत्री के साथ निवास करते थे, ऋषि वत्स की इस पुत्री मैं, बुद्धिमता और सौंदर्य का अटूट गड़जोड़ था, इन्हीं का नाम था Deepawali,

Deepawali को देखते ही, दोनों युवान ( विरोचन और सुधनवा ) मन्त्रमुघ्द हो गए, दोनों ने दीपावली के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा, और deepawali से, स्वयं अपना वर चुनने की, गुजारिश की, deepawali स्वयं दोनों युवान मैं से, किसी को आहात करना, नहीं चाहती थी, इस कासे रण उन्होंने अपने विवाह हेतु, ये फैसला अपने राज्य के राजा, अर्थात विरोचन के पिता, भक्त प्रह्लाद से करने को कहा, जब भक्त प्रह्लाद ने सभी स्थतियों का अवलोकन किया, तो पुत्र मोह की परवाह किये बिना, Deepawali का विवाह, अंगिरा के पुत्र, सुधनवा से करवा दिया, इसी विवाह को, पूरे राज्य मैं, बड़ी धूमधाम से मनाया गया, और बाद मैं, कई हजार बर्षों तक, Deepawali के विवाह की बर्षगांठ के रूप, परम्परागत इसे “पर्व” का नाम दे दिया गया, बाद मैं भगवान् राम के वनवास से लौट के आने पर, इसी दिन को राम आगमन त्यौहार के नाम से मनाया जाने लगा, जो आजकल प्रचलित है

deepwali पर्व का, चौथा और सबसे महत्त्वपूर्ण कारण

14 बर्ष के वनवास के बाद, भगवान् राम का, अयोध्या मैं वापिस आगमन ही, deepwali पर्व का, चौथा और सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है, जिससे आप सभी परिचित हैं

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