धर्म क्या है, धर्म का अर्थ जानें, क्या हम सभी धार्मिक हैं ?

धर्म का अर्थ जानने से पहले, आज के समय. धर्म से होने वाले नुकसान जान लेना, ज्यादा जरुरी है, क्योंकि एक कहावत है, पहले समस्यायें बनती हैं, बाद मैं समाधान, इसी तरह धर्म के बिना, समाज मैं कौन कौन सी समस्याएं उत्पन्न होती हैं, यदि ये साक्षात्कार आपने कर लिया, तो ज्यादा देर नहीं लगेगी, धर्म का अर्थ जानने मैं, तो समझिये, आज के समय

धर्म एक ऐसा शब्द, जिसकी वजह से, पृथ्वी के, कई हिस्से हो गए, देशों की बाउंड्रिया बन गई, Air route के नाम पर आसमान, और महासागरों के नाम से समुन्द्र, पशु – पक्षी, पेड़ पौधे, सब कुछ बँट गया, और ये सब कुछ क्यों बँट गया, क्या आप जानते हो ?, क्योंकि इन सबके बँटवारे से पहले, सबसे पहले इंसान बटाँ, वो भी धर्म के नाम पर,

परन्तु कितनी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि, आदिकाल मैं, जब धर्म की स्थापना की गई थी, तब इसका धर्म का उद्धेस्य था , एक दूसरे को एक दूसरे से जोड़ना, क्या इसे मानव इतिहास की अज्ञानता कहा जाए कि, एक ही परिवार मैं रहने वाले, सभी धार्मिक लोग, जो सुबह शाम आरती करते हैं, धुप और अगरबत्ती जलाते हैं, या समाज मैं रहकर अलग अलग उपासना विधि से, ईश्वर को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं, परन्तु आपस मैं झगड़ते रहते हैं, क्रोध, हिंसा, द्वेष, निराशा जैसी भावनाओं से भरे रहते हैं, क्या ये सभी धार्मिक हैं, या धार्मिक बनने का पाखंड करते हैं, या ये सभी वास्तविक dharm ka arth नहीं जानते, आइये इस पर शोध करें

धर्म की स्थापना

धर्म की स्थापना क्यों हुई ? dharm ki sthapna

इस गृह का,,,, या हो सकता है,,, पूरे ब्रम्हांड का,,,, तथाकथित बुद्धिमान जीव,, इंसान है, वही बुद्धिमान जीव, जो अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के कारण, खुद तो बटाँ ही, साथ ही साथ, पूरी सृष्टि के भी, टुकड़े टुकड़े कर दिए, अगर इतना सब कुछ बांटने के बाद भी , इंसान अब भी,,, स्वयं को बुद्धिमान समझता है,,, तो वे लोग जो कौन थे, जिन्होंने “वसुधैव कुटुंबकम” अर्थात, पूरी पृथ्वी एक परिवार है, जैसे उपदेश दिए,

क्योंकि धर्म की स्थापना का, मुख्य उद्देस्य ही, पृथ्वी को एकता के सूत्र मैं, बाँधने की प्रक्रिया है, तो आज धर्म के नाम पर, देशों के, विचारों के या दिलों के बंटवारे, क्यों हो रहे हैं ?, मेरा वादा है, कि इसका उत्तर जानकार, आपको गहरी ठेस पहुंचेगी, हो सकता है, आप इस लेख को ही, बिना पढ़े चले जाएँ, फिर भी सही बात तो मैं, कहके रहूँगा, इस “टुकड़े टुकड़े” विचारों का कारण है, हमें धर्म का पाठ पढ़ाने वाले ये ढोंगी, जो शायद खुद भी नहीं जानते, कि dharm ka arth क्या होता है

धर्म की उत्पत्ति

धर्म शब्द की उत्पत्ति कब और क्यों हुई ?

धर्म शब्द की उत्पत्ति से सम्बंधित साक्ष्य प्रस्तुत करने से पहले, एक बात समझ लें कि, अब हम जो बात, आपको बताने जा रहे हैं, उसे समझने के लिए, सर्वप्रथम आपको अपनी झूठी – सच्ची कल्पनाओं को, भूलना होगा, इसे समझने के लिए, पहले आपको ये तय करना होगा कि, ये जानकारी आत्मसात करने के लिए आपने,,, “अहम्” की मुट्ठी बाँधी हुई है, या “समर्पण” की अंजुरी बनाई हुई है,

  • मुट्ठी जोकि “अहम्” का प्रतीक है, मुट्ठी बांधकर, नदी से यदि पानी निकालने का प्रयास करोगे, तो पानी नहीं आएगा, क्योंकि मुट्ठी का अर्थ है, कि आपने अपना हाथ बंद कर लिया, अब इसमें पानी नहीं आ सकता
  • और अंजुरी जोकि समर्पण का प्रतीक है, का अर्थ है, आपने एक ओर से, हाथ खोल दिए हैं, जिसमें पानी भर जाएगा,
  • इसी प्रकार यदि आपने, अपने मस्तिष्क को, फ़ालतू के विचारों से भर रखा है,,, तब विश्वास कीजिये, उसमें कोई भी ज्ञान की बात, न तो अंदर जायेगी और न ही, आपके मस्तिष्क मैं ठहर पायेगी,
  • इसलिए कुछ देर के लिए ही सही, दशकों से इकट्ठी की हुई, अपनी अमूल्य विरासत ( अर्थात विचारों को ) ,, भूल जाईये, और ध्यान से, dharm ka arth और इसकी उत्पत्ति को, विज्ञान के हिसाब से समझिये

ध्यान रखें, आप हिन्दू हों, मुस्लिम हों, ईसाई, सिक्ख या, अन्य किसी सम्प्रदाय से हों, आप सभी को, dharm ka arth समझना इसलिए जरुरी है, क्योंकि धर्म किसी विशेष सम्प्रदाय का अधिकार, या संपत्ति नहीं, बल्कि धर्म तो एक जीवनशैली है, जीव से मनुष्य बनने के विज्ञान है, विज्ञान भी कहता है, कि हम डायरेक्ट मनुष्य नहीं बने, करोड़ों बर्ष मैं, हमारा ये शरीर, मानव रूप मैं, विकसित हो पाया है, इसी प्रकार धर्म मैं भी अवतारों का वर्णन, जीव से इंसान बनने की ही प्रक्रिया है, सैकड़ों प्रकार के शारीरिक बदलाब, और हजारों बर्षों के आदिवासी जीवन के पश्चात, जब मानवरूपी जीव ने, अपने खाने पीने रहने से अधिक सोचना शुरू किया तो,, अपनी भावनाएं व्यक्त करने हेतु, बोलना / लिखना / और पढ़ना शुरू किया तो, कम समय मैं, अपनी संतानों को समृद्ध बनाने हेतु, अपनी जीवनशैली के, महत्त्वपूर्ण नियम, आदतों या कलाओं, या “आधारों” को,, लिखना भी शुरू कर दिया, जीवनशैली की इसी किताब को, धर्म कहते हैं,

धर्म के आधार

तो क्या, हमारी सभी आदतें, धर्म हैं ? | kya hai dharm ka aadhaar ? |

नहीं, हमारी सभी आदतें, धर्म नहीं है, यदि ऐसा होता, तो हम सभी धार्मिक होते, क्योंकि “पूजा – पाठ, जप – तप, नियम -संयम” ,, ये तो सभी जीव् और मनुष्य, अपनी अपनी जीवनशैली के हिसाब से,, करते ही हैं

यहाँ तक की, असुर, दैत्य और राक्षस,, ये मनुष्यों से ज्यादा कठोर, जप – तप, उपासना विधि का पालन करते हैं, परन्तु ये सभी धार्मिक नहीं है
यदि आपको पता न हो, तो बता दें, प्राचीन समय मैं, जब गृहस्थी / विवाह जैसी जिम्मेदारियां / परम्पराएं नहीं थीं, तब इंसानों मैं, 2 तरह की, जीवनशैली प्रचलित थी
एक शहरी और एक जंगली ( आदिवासी)
इन दोनों जीवनशैलियों मैं, भिन्न भिन्न प्रजातियां होती थीं जैसे –

  • जंगलों मैं रहने वाली प्रजातियां – अस, रक्ष, दैत्य, नाग, दानव आदि
  • शहरों मैं विकसित जीवन – यक्ष, गंदर्भ, देव, साधू, सन्यासी, आदि

शहरों मैं विकसित जीवन – यक्ष, गंदर्भ, देव, साधू, सन्यासी, आदि
इन दोनों जीवनशैलियों मैं लोग, अपनी अपनी रिवाजों के मुताबिक़, उपासना विधि किया करते थे,

जैसे = शुम्भ, निशुंभ, हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्यप, बली, रावण इत्यादि, आपको तो ज्ञात ही होगा,,, इनमें से कई का नाम, तो बहुत बड़े बड़े उपासकों की श्रेणी मैं, लिये जाता है, परन्तु क्या ये सभी धार्मिक थे ?

रावण के बारे मैं अधिक जानकारी के लिए, बटन पर क्लिक करें

नहीं इनमें से कोई, धार्मिक नहीं था, बल्कि ये सभी तो, असुर, राक्षस, दैत्य या दानव प्रजाति के थे, इसका अर्थ ये हुआ, कि हम सभी जो उपासना विधि, Follow करते हैं, ये धर्म का मार्ग हो सकता है, पर ये धर्म नहीं है, बर्षों से पाला हुआ, आपका भ्रम भी आज, चकनाचूर हो गया होगा, अब तक मन मैं, प्रश्न भी आ गया होगा,, तो फिर ऐसी क्या चीज है, जो हमें धार्मिक या अधर्मी बनाती है, बर्षों पश्चात, आज फिर से आपके दिमाग मैं, dharm ka arth जानने की जिज्ञासा ने, विकराल रूप लिया है, तो आईये जानते हैं, “धर्म का वास्तविक अर्थ” dharm ke aadhaar

धर्म एक दवा

धर्म का अर्थ है, बीमारी का इलाज

dharm ka arth, शरीर मैं कई प्रकार की बीमारियों का इलाज भी हो सकता है, ये बात पढ़ने मैं आपको, हास्यापद लगेगी, क्योंकि 2000 बर्षों की ग़ुलामी ने, हमारे सनातन धर्म को,,, हंसी का पात्र और मुगलों / अंग्रेजों को महान बना दिया, ये हमारी कमियां ही तो हैं
मेरा एक प्रश्न है आपसे
10 -15 बर्ष पहले, क्या कभी आपके साथ ऐसा हुआ था, कि बिजली के खम्बे से, अधिक वोल्टेज प्रवाहित हुए, आपके इलेक्ट्रिसिटी वायर मैं, अधिक मात्रा मैं बिजली आयी, इससे आपके घर का, कोई इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्ट (पंखा /टीवी /फ्रिज/ या कूलर) फुक गया, अवश्य हुआ होगा, परन्तु आज ऐसा बहुत काम होता है, क्योंकि अब आपके घरों मैं, MCB का प्रयोग होता है

या ऐसे समझें, एडॉप्टर की खराबी के कारण, अनियंत्रित वोल्टेज सप्लाई की वजह से, आपके टीवी / लैपटॉप /AC / या पंखे के, कुछ पार्ट्स जैसे, आईसी, कंडेंशर या मोटर फुक जाती है
ऐसे मैं आप उस इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद के, फुके हुए पार्ट्स को बदलवा देते हैं, साथ ही साथ अपने एडॉप्टर को भी सही करवा लेते हैं, इन उत्पादों मैं, कुछ के एडॉप्टर Inbuilt होते हैं, कुछ के एक्सटर्नल होते हैं, जैसे आपके टीवी का एडॉप्टर Inbuilt होता है, परन्तु लैपटॉप का चार्जिंग वायर मैं लगा होता है

प्रश्न : परन्तु आप यदि अपने उत्पाद के, फुके / खराब हुए पार्ट को सही करवा लो, और एडॉप्टर को सही न करवाओ तो क्या होगा ?
उत्तर : अब वोल्टेज अनियंत्रण की वजह से, रोज कुछ न कुछ खराब होगा
यही बात, पकड़ने वाली है, आज के संघर्षवादी युग मैं, बाहरी स्थितियों विचारों मैं, बदलाब के कारण, हम हतप्रभ हो जाते हैं, ऐसे मैं स्थितियों के अनुरूप, शरीर मैं विभिन्न प्रकार के आवेश उत्पन्न होते हैं, ये आवेश मानसिक असंतुलन (अनियंत्रित वोल्टेज ) पैदा करने के साथ साथ, शरीर के विभिन्न अंगों को भी, नुक्सान पहुंचाते हैं, बाद मैं, डॉक्टरों या दवाओं की सहायता से हम, अपने इन अंगों मैं आयी कमी को तो, कम या ख़त्म करने मैं सक्षम होते हैं, परन्तु अपने एडॉप्टर अर्थात वोल्टेज कंट्रोलर या कहें तो, विचार नियंत्रण प्रणाली (मस्तिष्क) को सही नहीं करवाते
इस कारण, 30 की उम्र के बाद, मस्तिष्क पर जिम्मेदारियों के बोझ के बढ़ने के साथ – साथ, भावों या विचारों को नियंत्रण करने वाला मस्तिष्क ( एडॉप्टर / वोल्टेज कंट्रोलर) अपना काम ठीक से कर पाने मैं, असमर्थ होता है, तत्पश्चात एक के बाद बीमारियों का प्रहार हम पर बना रहता है, क्योंकि मस्तिष्क एक भावनात्मक अंग है, और दवाइयां हमारे भौतिक अंगों पाए react करती हैं, इस कारण लगातार डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की बढ़ती संख्या, इन बीमारियों को ख़त्म तो क्या कम कर पाने मैं भी सक्षम नहीं हैं,
परन्तु धर्म के द्वारा ,, किसी भी परिस्थिति या विचारों के बदलने के वाबजूद भी,, आप अपने शरीर के अनियंत्रित आवेगों को, संतुलित और नियंत्रित कर सकते हो,,, शरीर मैं इन आवेगों को नियंत्रित, करने के लिए, धर्म के इन 5 आधारों का बोध होना जरुरी है

उत्तर : श्री मान, मैंने ऐसा नहीं कहा कि लोगों को ये क्रियाएं नहीं करनी चाहिए, ये क्रियाएँ अवश्य करनी चाहिए, परन्तु ये धर्म नहीं,
24 घंटे, सामाजिक कार्यों मैं व्यस्त रहने के कारण, बुद्धि अपने आपको समाज का ही, हिस्सा समझ लेती है, इससे आत्मज्ञान नष्ट हो जाता है, जबकि बच्चा पैदा ही आत्मज्ञान के साथ होता है, परन्तु अपने स्वादों के उपभोग करते करते वह, खुद को भूल जाता है, स्वयं को याद दिलाने हेतु, कि आप सिर्फ विचार न होकर, प्रकृति का हिस्सा हैं, इसलिए आपको प्रतिदिन अयहाँ पनी अपनी सुविधा के हिसाब से, पूजा पाठ करना चाहिए, परन्तु जैसा मैंने कहा, ये धर्मपथ है, इस पर चलके आगे बढ़ना है, पहले कक्षा एक, फिर दो, फिर तीन,, जैसे बच्चा अध्यन करता है, ठीक वैसे,, परन्तु लोग इस प्रक्रिया को ही मंजिल समझ लेते हैं, जो कि निहायती गलत है, स्वयं को प्रकृति के रूप मैं पहचानना ही आत्मज्ञान है, प्रकृति का वास्तविक अर्थ ही भगवान् है

क्या हैं, dharm ke aadhaar ? | dharam meaning

धर्म का अर्थ समझने के लिए, आवश्यक है, कि सबसे पहले धरम के इन 5 आधारों को समझा जाय, वैसे तो ये आदतें ही हैं, परन्तु कई बार, काल, देश या भिन्न जलवायु, के हिसाब से भी, आदतों मैं भिन्नता पाई जा सकती है, इसलिए हमारी सभ्यता मैं, इन्हें आधार कहते हैं, आधार या स्तंभ यानी ऐसी ऐसे मानक, जिनके वगैर “मानवीयता” का अस्तित्व ही नहीं हो सकता, तो आइये जानते हैं धर्म के ये 5 आधार, जिनके बिना dharm ka arth जानना असंभव है

अगर अब भी आप, धर्म के इन 5 आधारों को, किसी विशेष सम्प्रदाय से जोड़ रहे हैं, तो ये आपका अज्ञान है, क्योंकि जिस तरह शरीर के रोगों के लिए चिकित्सिक और मस्तिष्क के रोगों के लिए मनोचिकित्सिक की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार विचारों को शुद्ध करने धर्मगुरुओं की,
पर हमारे “धर्मगुरु” या तो, इन बातों को जानते नहीं हैं या वे आपको बताते नहीं, और या फिर, आप सत्य सामना नहीं सकते, इसलिए dharm का सही अर्थ पूंछते नहीं है

धीरज

धीरज – धर्म का पहला आधार

धर्म का पहला आधार है, धीरज, जोकि आपके शरीर को स्थिर करता है, जी हाँ धीरज एक भाव है, किसी घटना के उपरान्त, शरीर मैं, सर्वप्रथम होने वाली प्रतिक्रियाओं को, भाव कहते हैं, बाद मैं इन्ही प्रतिक्रियाओं को आप, शब्दों के रूप मैं, व्याख्या करते हैं,

धीरज एक ऐसा भाव है, जो आपके शरीर के आवेशों को, नियंत्रित करता है, ये आवेश, अहम्, मोह, क्रोध, हताशा, निराशा, सम्मान, अपमान या किसी अन्य किसी प्रकार का, उत्साह हो सकता है, इन आवेशों के कारण, व्यक्ति के शरीर का, रक्तचाप बढ़ जाता है, कभी कभी तो ये रक्तचाप इतना बढ़ जाता है,

  • कि क्रोध मैं, लोगों के हाथ के हाथ पैर कांपने शुरू हो जाते हैं
  • निराशा मैं, आत्महत्या कर सकता है
  • मोह मैं, बिना विचार किये, व्यक्ति अनावश्यक वचन दे सकता है
  • मीठी चुपड़ी बातों का, शिकार बन सकता है
  • किसी की बात, पूरी होने से पहले, अपनी बात बोलना शुरू कर देते हैं
  • ये आवेशात्मक स्थिति, बुरे कर्म या गलत निर्णय को भी, परिणाम देती है

इसीलिए व्यक्ति कभी आवेश मैं आकर, स्वयं को किसी प्रकार का, नुक्सान न पहुंचाएं, इस कारण, “धीरज” जैसे शुद्ध भाव का निर्माण किया गया, ये भाव धारण तो “मस्तिष्क” के जरिये किया जाता है, परन्तु इसका कण्ट्रोल, शरीर के सभी अंगों, जैसे पांचों ज्ञानेन्द्रियाँ, पांचों कर्मेन्द्रियों त्वचा, मन बुद्धि, सब पर होता है, इसलिए इसे धर्म ( Religion ) का पहला आधार माना गया है,

समर्पण

“समर्पण” – धर्म का दूसरा आधार

धर्म का दूसरा आधार है “समर्पण”, ये वही शुद्ध भाव है, जो आपके मन को स्थिर करता है, कुछ लोग “समर्पण” को संपत्ति से जोड़ देते हैं, जैसे भाई का अपने दूसरे भाई के लिए, संपत्ति को समर्पित कर देना, जबकि ऐसा नहीं है, “समर्पण” किसी संपत्ति का नहीं, बल्कि विचारों का, दिया जाता है, एक ध्यान रखने योग्य बात है, कि समर्पण सदैव अग्रिम के प्रति होना चाहिए

  • जैसा कि आप जानते हो, आजकल किसी काम को करते वक़्त
  • अच्छी बातें सुनते वक़्त
  • खाना खाते वक़्त
  • टीवी देखते वक़्त
  • यहाँ तक कि, ड्राइविंग करते वक़्त भी ,

आप कोई न कोई विचार, बनाते रहते हो, किसी भी महत्त्वपूर्ण कार्य को करते वक़्त भी, अन्य किसी बात पर विचार करते रहना, ये आपका साइड बिज़नेस बन गया है, इसी साइड बिज़नेस के कारण, आपका ध्यान वर्तमान के, महत्त्वपूर्ण कार्य से, हट जाता है, या कम हो जाता है,,,,आजकल, माता पिता के अच्छे शब्द भी, बच्चों को आकर्षित नहीं करते, “धर्मगुरुओं” की तो सुनेंगे ही क्या,,,, इसका कारण है कि आजकल के बच्चे , इतने अधिक महत्त्वाकांक्षी हो गए हैं, कि वे –

  • अपने, माता पिता की आज्ञा के पालन के लिए
  • पढाई के लिए,
  • या अपने कॅरिअर के लिए भी

अपने तुच्छ विचारों का, समर्पण नहीं कर सकते, जबकि आपको याद हो,,, मोह से भरे अर्जुन ने, जब श्री कृष्ण से, गीता का पवित्र ज्ञान प्राप्त करने की, इक्षा दिखाई, तो कृष्ण ने, सबसे पहले अर्जुन से, अपना “समर्पण” देने को कहा, अर्थात मोह से भरे अपने विचार, त्यागने को कहा, मेरा मतलब है, कि यदि आप अपने विचारों को, छोड़ने मैं सक्षम होंगे, तभी आप नई जानकारी, नई विचारधारा या नए ज्ञान से जुड़ पाएंगे, क्योंकि परिवर्तन ही संसार का नियम है, इसीलिए “समर्पण”, धर्म का दूसरा आधार है,
आप भी यदि इसे लेख को, गहराई से, नहीं समझ पा रहे, तो आपमें भी “समर्पण” का आभाव है, पढ़ते वक़्त भी, किसी अन्य बिषय पर,, आप विचार बनाने मैं व्यस्त हैं,, इस कारण आपमें, dharm ka arth समझने की क्षमता नहीं, इसलिए चाहें तो एक बार फिर से, अपने विचार त्यागकर, लेख को ठीक से समझने का प्रयास करें,

ज्ञान

ज्ञान – धर्म का तीसरा आधार

धर्म का, तीसरा आधार है “ज्ञान”, जोकि आपकी बुद्धि को स्थिर करता है, वैसे तो भ्रांतियों मैं, ज्ञान को, किसी दिव्य या चमत्कारी होने से, जोड़ा जाता है, ढोंगियों द्वारा दिए गए उपदेशों मैं, किसी जंगल मैं, सैकड़ों या हजारों बर्षों की तपस्या के बाद, ज्ञान प्राप्त होता है,
परन्तु मेरे हिसाब से जंगलों मैं, हजारों बर्षों से भी ज्यादा का, समय लग सकता है, और तपस्या करके, ज्ञान प्राप्त करना तो, और भी कठिन है, क्योंकि जाहिर है, जंगलों मैं, ज्ञान के साधन ही बहुत कम होते हैं, और तपस्या करते हुए, यानी आँखें भी बंद करके, तो ज्ञान के द्वार ही बंद हो जायेंगे, तो जाहिर है, बड़ा मुश्किल काम होगा,

अंधविश्वास है ये सब, ज्ञान का वास्तविक अर्थ है, जानकारी, ये जानकारी, जीवन या समाज जैसे, किसी भी महत्त्वपूर्ण बिषय पर हो सकती है, परन्तु जंगलों मैं, न तो इंसानों वाला जीवन है, न समाज,
परिवार या समाज मैं रहकर, व्यक्ति प्रेम, बलिदान, सम्मान जैसे भावों का आदान प्रदान सीखता है, परिवार की जिम्मेदारी का, भार लेता है, सत्य और अहिंसा की पूजा करता है, बड़ों की आज्ञा का पालन करता है, और छोटों का मार्गदर्शन करता है विज्ञान से सम्बन्ध साधने का, प्रयास करता है, इसलिए गृहस्थ जीवन को, सबसे श्रेष्ठ माना जाता है,
यही सब तो ज्ञान है, जोकि धर्म का तीसरा और सबसे मुख्य आधार है, परन्तु जंगलों मैं, ये कुछ नहीं होता, तो जंगलों मैं क्या ज्ञान मिलेगा, जरुरी नहीं कि व्यक्ति को सभी विषयों का ज्ञान हो, इसलिए जिस बिषय पर ज्ञान न हो, उस पर न्याय करना असंभव है, अर्थात यदि आपको प्लम्बर के काम का ज्ञान नहीं, तो अपने घर मैं, स्वयं प्लम्बर न बनें, न ही इस बिषय पर, अपने पडोसी को, कोई राय दें

न्याय

न्याय – धर्म का, चौथा आधार है

न्याय,, धर्म का, चौथा और सबसे शुद्ध आधार है, जोकि आपकी आत्मा को स्थिर करता है, शरीर के सभी स्वाद और अनुभव, गुण और कर्म, आपकी चेतना, कर्मेन्द्री और ज्ञानेन्द्रियों द्वारा, किये या भोगे जाते हैं, परन्तु आपकी आत्मा का, इसमें कोई रोल नहीं होता, इसलिए एकमात्र आत्मा को ही सबसे, शुद्ध माना जाता है, इसलिए इस भाव ( न्याय ) को शुद्ध कहा जाता है, न्याय करने से पहले, आपमें जो योग्यतायें अनिवार्य हैं वे हैं –

  • न्याय के वक़्त, आपका बुद्धि काम, क्रोध, लोभ, मोह या अहम् जैसे द्वेषों से, रहित होनी चाहिए
  • आपको परिस्थति या बिषय का, ठीक ठीक ज्ञान होना चाहिए
  • बिषय के प्रति आपकी जानकारी, क्लियर होनी चाहिए

ऐसी स्थिति मैं, यदि आप कोई निर्णय या न्याय करेंगे, वही न्याय असली न्याय होगा, परन्तु

  • एक माँ जो अपनी संतान से मोह रखती है, पडोसी के बच्चे से झगड़ा होने पर, वो हमेशा अपने बच्चे की तरफदारी करेगी, परन्तु उसे न्याय कहना उचित नहीं
  • अहम् या अपमान मैं फंसा व्यक्ति, किसी अन्य को, सम्मान नहीं दे सकेगा
  • लालच मैं फँसे अधिकारी, धनी लोगों से, पैसे लेकर, उन्हें जुर्म करने का बढ़ावा देते हैं

यही सब “अन्याय” है, जबकि धर्म का चौथा आधार “न्याय” है, ऐसे न्यायवान लोगों के कारण ही, सत्य और अहिंसा की पूजा होती है, बिना ज्ञान (जानकारी ) के,न्याय असंभव है, और बिना न्याय के, dharm ka arth समझने से कोई फायदा नहीं

प्रेम

प्रेम – धर्म का, पांचवां आधार है

धर्म (Religion ) का पांचवां आधार है, प्रेम,, ये वही भाव है, जोकि आपके ह्रदय स्थिर करता है, इसे ऐसे समझिये, इंसान का ह्रदय, एक मिनट मैं 60 से 80 बार धडकता है, आवेशात्मक स्थिति मैं, या किसी मेहनत के काम को करते वक़्त, आपके ह्रदय की गति, और भी अधिक बढ़ जाती है, जैसे –

  • भागते वक़्त, धड़कनें तेज हो जाती हैं
  • जिम मैं, व्यायाम करते वक़्त
  • क्रोध मैं, आते ही, धड़कनें तेज हो जाती हैं
  • शरीर मैं, कई प्रकार के आवेश और उत्साह, ह्रदय की गति को तेज करते हैं
  • किसी चिंता या दुःख मैं, ह्रदय गति बढ़ जाती है
  • किसी से बिछड़ने का गम, (मोह )ह्रदय की गति बढ़ाता है

अगर भविष्य मैं, वैज्ञानिकों द्वारा, कभी इस प्रकार के शोध हुए, तो वैज्ञानिक जान पाएंगे, कि यदि ह्रदय धड़कने की गति को कुछ धीमा किया जाये, तो इंसान की आयु मैं, बढ़ोतरी हो सकती है, हमारा अनुमान है, कि आज के युग मैं, ह्रदय की गति ( 60 से 80 ) ये कोई मानवीय प्रक्रिया नहीं है, हो सकता है, सैकड़ों बर्ष पहले, ये गति 30 – 40 या उससे भी कम होगी, इस कारण व्यक्ति की उम्र ज्यादा रहती होगी, परन्तु आज जहाँ पर्यावरण के बिगड़ते हालात, खान पान की कमी, शारीरिक क्षीणता,,, इस कारण आज, ह्रदय गति का स्कोर, 60 से 80 बार तक है,

परन्तु जब आप अपनी संतानों, परिवार के सदस्यों या अन्य किसी भी कारणों से, “प्रेममय” होते हैं, तो अचानक ह्रदय की गति मैं, परिवर्तन आ जाता है, ये बहुत अधिक मात्रा मैं, घट जाती है, जोकि आपकी दीर्घायु का परिचायक है, प्रेम का ये भाव, न सिर्फ आपके ह्रदय को स्थिर करता है, बल्कि ये समानता और एक दूसरे से, जुड़ाव का भाव भी बढ़ाता है, इसीलिए प्रेम के इस भाव को, धर्म का, पांचवां आधार माना जाता है, यही पांचों आधार मिलकर, dharm ka arth निर्धारित हैं

धर्म का महत्व

धर्म का महत्व एवं विश्लेषण

धर्म कहता है, कि इंसानों के शरीर मैं जीवन मिलना, इतने भर से, इंसान कहलवाना उचित नहीं, यदि आपको अपनी संस्कृति की जानकारी हो तो, इंसान के शरीर को नहीं, बल्कि विचारों को महत्त्व देकर ही, उसकी जाती और प्रजाति निश्चित की जाती थी, जैसे –

  • देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, नाग – ये सभी इंसानी शरीर मैं, नकारात्मक विचारों वाले, अधर्मी लोग हैं, जिनके पास,,, धीरज, समर्पण, ज्ञान, न्याय या प्रेम जैसे भावों का, अभाव होता है,
  • ऋषि, मुनि, साधू, कुलदेवता, देव, भगवान् – ये सभी इंसानी शरीर मैं, सकारात्मक विचारों वाले लोग हैं, जिनमें धीरज, समर्पण, ज्ञान, न्याय या प्रेम जैसे भावों की, प्रचुरता पायी जाती है

बाद मैं जब, आदिवासी जातियां ख़त्म हो गई, सारा सामाज ज्ञान और विज्ञान जैसी मजबूत विचारधाराओं से, जुड़ गया, उस समय मनुष्य के विचारों को ही, महत्त्वपूर्ण समझते हुए, लोगों को, 4 प्रकार की जातियों में बांटा गया, जिसे आज हम, ब्राह्मण, शूद्र, वैश्य या क्षत्रिय कहते हैं, फिर से समझ लें, ये जातियां न तो जन्म पर निर्भर हैं, न कर्म पर, ये जातियां मनुष्य के विचारों पर निर्भर हैं

इसलिए आप सभी को, ये समझना जरुरी है, कि जो लोग पूजा – पाठ जप – तप या कड़े नियम – संयम बरतने को, धर्म समझते हैं, ये उनकी मूर्खता है, क्योंकि ये सभी काम तो दैत्य, असुर और राक्षस भी करते हैं, बल्कि असुर और राक्षस तो, इंसानों से भी ज्यादा कठोर नियम, परम्परा अपनाते हैं, परन्तु जो विचार कोई अधर्मी, चाहकर भी नहीं अपना सकता, वो हैं – धीरज, समर्पण, ज्ञान, न्याय और प्रेम, जोकि धर्म का आधार हैं,

कोई भी मनुष्य, संसार के किसी भी सम्प्रदाय से सम्बन्ध रखता हो, आत्मज्ञान की, किसी भी पूजा पद्धति का निर्वाह करता हो, उसका भोजन या भजन किसी भी शैली का हो, वो तब तक धार्मिक नहीं है, जब तक उसमें धर्म के, ये 5 आधार, उपस्थित न हों

बगल मैं,,नदी बह रही हो,,,पर मुझे प्यास ही नहीं लगी,,तो मेरी तृप्ति कैसे होगी ?
✨नदी के होने का लाभ,,या तृप्ति तो उसी को होगी,,जो प्यासा होगा,
यहाँ लोगों मैं ज्ञान की प्यास ही नहीं,
ऐसा नहीं कि, हमारी संस्कृति में ज्ञान की कमी है, इस कारण बेचैन लोग हैं, और इनमें अंधविश्वास प्रचलित है,,
👉बहुत से ऐसे महापुरुष हुए हैं,,अब भी हैं,,जो सामने वाले के विचार तक पढ़ सकते हैं

👉परंतु आज, ,हमारा दुर्भाग्य है,, कि समाज में,,,लोगों मैं, ज्ञान पाने की “प्यास” ही समाप्त हो गई है,, जब प्यास ही नहीं, तो संतुष्टि कैसे मिलेगी

धर्म और कानून

dharam aur kanoon मैं क्या समानता है ?

dharam aur kanoon मैं, बहुत बड़ी समानता भी है, और बहुत बड़ा अंतर भी, यहाँ पहले dharam aur kanoon की समानता समझ लेते हैं, सबसे पहले समझ लें कि, dharam aur kanoon दोनों का उद्देश्य समाज मैं, सत्य और अहिंसा की स्थापना करना है, क्योंकि dharam मैं भी, “मानवीयता” पर जोर दिया जाता है और kanoon मैं भी “मानवीयता” की रक्षा करने हेतु, समाज मैं न्याय की व्यवस्था बनाई जाती है

dharm aur qanoon मैं क्या अंतर है

तार्किक बुद्धि का प्रयोग करते हुए, यदि समझें तो, dharm मैं इंसानियत कायम रखने हेतु, धर्म के 5 आधार ( धीरज, समर्पण, ज्ञान, न्याय और प्रेम ) बनाये हैं, व्यक्ति को इन्हीं, निर्धारित आधारों पर अमल करने हेतु, जीवन भर, प्रेरित किया जाता है, समझने योग्य बात ये है, कि आज के समाज मैं भी, न्याय की व्यवस्था स्थापित करने के लिए, Dharam ज्यादा कारगर सिद्ध हो सकता है, क्योंकि dharam मैं सिर्फ इन 5 बातों पर अमल करना है

मेरा दावा है, कि 1950 से अब तक, qanoon की जितनी धाराएं बनी हैं, आगे जितनी भी बनेंगी, इंसानी दिमाग हर बार, उन धाराओं से बचने का, कोई न कोई उपाय निकाल लेगा, समाज जितना विकसित होगा, उतने अधिक असंवैधानिक प्रणालियाँ बनाई जायेंगी, क्योंकि ताले की चाबी खोजना, तार्किक दिमाग की फिदरत है, इसलिए प्रत्येक माता पिता को चाहिए, कि अपनी अपनी संतानों को, बचपन से ही, धर्म का ज्ञान दें, ताकि भविष्य मैं वे, qanoon का बिना पाठ पढ़े भी, kanoon के नियमों का पालन करते रहें , संवेदन और खुशहाल जीवन व्यतीत कर सकें

धर्म और अन्धविश्वास

धार्मिक बनना आसान है या अंधविश्वासी ?

वैसे तो परम्परावादी लोग, किसी बात को मानकर, उसे आजीवन निभाते रहने मैं, ज्यादा यकीन रखते हैं ऐसे लोगों को अंधविश्वासी कहते हैं, समाज मैं अधिकाँश लोग, अंधविश्वासी बनना, ज्यादा आसान समझते हैं, क्योंकि उनका मानना है, कि ऐसा करने मैं, अपने दिमाग का, ज्यादा उपयोग नहीं करना पड़ता, ऐसे लोगों को, अपने धर्म पर बड़ा गर्व होता है, परन्तु हकीकत मैं ये लोग ही, अधर्मी होते हैं, ये लोग पुरानी रिवाजों को, अपनी जान से भी ज्यादा सुरक्षित रखते हुए, निभाते हैं, क्योंकि ऐसे लोग कड़े नियमों का पालन करते हैं, इस कारण ये, धार्मिक बनने को, कठिन मानते हैं

धार्मिक कैसे बनें ?

मेरा मानना है, कि अंधविश्वासी बनने से ज्यादा आसान है, धार्मिक बनना, क्योंकि धार्मिक बनने के लिए, आजीवन किसी परम्परा का निर्वाह, नहीं करना पढ़ता, बल्कि एक बार किसी परम्परा का अर्थ समझकर, भविष्य मैं उसे निभाने या बंद करने का, निर्णय लिया जा सकता है, समझदार व्यक्ति, समय के हिसाब से, मुरझा चुकीं, पुरानी परम्पराओं को तोड़कर, नयी परम्पराओं का शिलान्यास करते हैं, वे ऐसी परम्पराएं शुरू करते हैं, ताकि आगे की जनरेशनों को भी लाभ प्राप्त हो, परन्तु समझने वाली बात ये है, कि धार्मिक गतिविधियों के अलावा, कोई भी परम्परा या नियम, सभी के लिए और सदा के लिए, सुखदायी नहीं होते, समय के हिसाब से इन्हें बदलते रहना ही, एक धार्मिक व्यक्ति की पहचान है

अपने विचारों को, महत्त्वपूर्ण समझना, इस तरह स्वयं को अत्यधिक महत्वाकांक्षी बनाना या अहम् को धारण करना, न सिर्फ अमानवीयता है, बल्कि इससे स्वयं के चरित्र की हानि होती हैं, तनाव भी बढ़ जाता है, तनाव जैसी इस मानसिक बीमारी से, निजात पाने के लिए, अपने Search browser मैं, Stress management dharmguru टाइप करें, आप चाहें तो नीचे बटन पर क्लिक करके, डायरेक्ट पेज पर विजिट कर सकते हैं, यदि आपको हमारा लेख अच्छा लगा, तो Social media पर, हमें Follow करें, आप अपने प्रश्न पूंछें या सुझाव दें, ताकि हमें और motivation मिले

सदियों से हमारा देश भारत, धन और ज्ञान की जननी रहा है, परन्तु विदेशों से, लूट के उद्देश्य से आये आक्रांताओं ने, धन के साथ – साथ हमारी वैचारिक धरोहर, हमारा सांस्कृतिक ज्ञान भी लूटा, इसमें से लाखों पुस्तकें, ये लुटेरे अपने देश ले गए, और हजारों भारतीय पुस्तक संघ्रालय जला दिए गए, इस कारण भारतीयों की आर्थिक और वैचारिक दशा कमजोर हो गई,
उसके बाद हमारे इतिहास मैं ऐसी भ्रांतियां उत्पन्न की गईं जैसे – सन 1498 मैं, एक विदेशी नागरिक “वास्कोडिगामा” ने “भारत” की खोज की, अब बताओ यदि 1498 ईश्वी मैं, “वास्कोडिगामा” ने “भारत” की खोज की होती, तो ईसा के जन्म से पूर्व सिकंदर ने आक्रमण, किस देश पर किया था ?
भ्रमित बातें हैं ये सब, विश्वास मानिये शुरू से हमारा देश ऐसा नहीं था, भारत का इतिहास जानने के लिए नीचे बटन पर क्लिक करें