Spiritual development क्या है, और कैसे करें ?

Spiritual development का अर्थ है, आध्यात्मिक विकास, किसी भी व्यक्ति के अंदर, आध्यात्मिक विकास उसकी उम्र और उसकी रूचि के अनुसार कम या ज्यादा स्पीड से होता है, आध्यात्मिक विकास होने के बाद, व्यक्ति के, जीवन जीने का तरीका बदल जाता है, ये अपने भीतर की अनुभूति है,
बाहर के लोग तो सदा की तरह, उस व्यक्ति के चरित्र का, उसी प्रारूप मैं आंकलन करते हैं, जैसी उनमें Spiritual development की हो , लोग अपनी अपनी आध्यात्मिक गति के अनुसार, अपना अपना जीवन व्यतीत करते हैं, उनके निर्णय लेने के तरीके और उनके विचार कितने प्रबुद्ध हैं ये उनके आध्यात्मिक विकास की ही पहचान है,
दो लोग या दलों मैं, आपस की बहस या स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की चाह, ये मूर्खता है, आध्यात्मिक लोगों को ऐसा करने से सदा बचना चाहिये, क्योंकि आध्यात्मिक व्यक्ति मैं, तर्क और संवेदनशीलता दोनों का प्रवाह होता है, फिर भी वह व्यक्ति तर्क का उतना ही प्रयोग करता है, जितने से समाज का भला हो सके, तो आइये जानते हैं, अपने अपने जीवन मैं, कैसे अपना अपना Spiritual development करें, इसके फायदे और नुक्सान

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Meaning

Spiritual development | आध्यात्मिक विकास का अर्थ ?

आध्यात्मिक विकास (Spiritual development) का अर्थ समझने के लिए, सबसे पहले हम अध्यात्म शब्द का संधि विच्छेद करेंगे
अध्य + आत्म = आध्यात्म (अर्थात आत्मा का अध्यन ही अध्यात्म कहलाता है )
जैसा कि आप समझ चुके हैं, जिस तरह हमारे ढोंगियों ने इसका वर्णन किया है, ये उस तरह की कठोर प्रक्रिया नहीं, ये अत्यंत सहज और आसान प्रक्रिया है, फिर इसे बढ़ा चढ़ा कर क्यों पेश किया जाता है, और हमें ये इतनी कठिन क्यों लगती है ?

तो इसका जवाब है, 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चलती गाडी को, अचानक विपरीत दिशा मैं नहीं मोड़ा जा सकता, इसके लिए आपको गाडी की रफ़्तार को, धीमा करना होगा, और धीरे धीरे ब्रेक लगाने होंगे, तब गाडी को मोड़ पाने मैं सक्षम होगे, अर्थात लगातार 20 – 30 या 50 बर्षों से, स्वार्थी विचार बनाने की प्रक्रिया को, अचानक विपरीत दिशा मैं, नहीं मोड़ा जा सकता, इसके लिए आपको भी धीरे धीरे प्रयास करने पड़ेंगे, आप को शायद अनुभव भी नहीं, कि लगातार विचार बनाने से दिमाग मैं तनाव उत्पन्न होता है, पर आज के समय उसी तनाव मुद्रा को, हम सामान्य समझते हैं, मतलब ये है, आपके दिमाग ने भी, आपके Unwanted विचारों की गति को, स्वीकार लिया है,

यदि आप भी इसी प्रकार, अपने अनियंत्रित विचारों से परेशान हैं, तनाव जैसी दिक्कत का सामना कर रहे हैं तो, नीचे लिंक पर Click करके, वैज्ञानिक शोधों के अनुसार तनाव मुक्त होने का, सही तरीका जानें

Discription

क्या है, आध्यात्मिक विकास ( Spiritual development) का सार ?

जैसा कि हमने इसके अर्थ के माध्यम से बताया था, कि आत्मीय अध्यन को ही, अध्यात्म कहते हैं, जैसा कि भगवान् कृष्ण ने गीता के एक श्लोक मैं कहा है,
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः, न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः
अर्थात विचारों से बिलकुल अलग, आत्मा एक ऐसी जीवनदायिनी ऊर्जा है, जिसका कोई रंग, गुण दोष या आकार नहीं है, ये बिलकुल ठीक आपके, कमरे मैं लगे Wi-Fi की तरंगों की तरह है, जिसे जलाना /भिगोना /काटना असंभव है, इसके होने का एहसास भी तभी होता है, जब आपके पास ऐसी डिवाइस ( मोबाइल / लैपटॉप /टैबलेट ) जैसा,, कोई ऐसा उपकरण हो, जो Wi – Fi को Support करता हो, जैसे ब्रह्मण्ड मैं, सिर्फ सजीव शरीर ( प्राकर्तिक उपकरण ) ही, आत्मा को Support करते हैं, आत्मा मैं, रंग /गुण / दोष आदि का आवागमन तब होता है, जब इसमें इन्द्रियों के माध्यम से, स्वाद या विषय डाले जाते हैं, और ये रंग /गुण / दोष हमारे भौतिक दिमाग के, मन (Internal storage) वाले हिस्से मैं, यादों या विचारों की तरह Store हो जाते हैं, यही यादें विचार, हमारे चरित्र की परिचायक बन जाती हैं

damage

अध्यात्म के बिना, जीवन के नुक्सान

बुद्धि का उपयोग आप सिर्फ, किसी बात को सुलझाने – उलझाने या निष्कर्ष तक पहुँचने मैं, करते हैं, बाकी खाली समय मैं ये एकत्रित किये हुए विचारों मैं ही, अनियंत्रित उथल – पुथल / जोड़ – घटाओ चलते रहते हैं, यही प्रक्रिया हमारे भीतर, भय / क्रोध / मोह / लोभ अहंकार जैसे अवगुण पैदा करती है, बाद मैं हम स्वयं को, इन्ही अवगुणों की पोटली समझ के जीते हैं, बचपन से, लगातार स्वयं के साथ इसी निंदनीय व्यवहार को करने के कारण, अन्ततः हम इसी दुर्व्यवहार को, अपना जीवन मान लेते हैं,

जिस तरह आपकी मोटर साइकिल मैं, सुनहरा “मोबिलआयल” डाला जाता है, और इंजन के लगातार चलते रहने से, वो सुनहरा “मोबिलआयल” काला पढ़ जाता है, उसकी चिकनाई ख़त्म हो जाती है, उसी प्रकार हमारे दिमाग के अनियंत्रित विचार / तर्क हमारी भावनाओं को दूषित कर देते हैं, ये हमारे दिमाग मैं उपस्थित डोपामीन नाम के पदार्थ को, ख़त्म कर देते हैं, ये प्रक्रिया इंसान को बेचैनी और असंतुष्टि प्रदान करती है, इंसान के मस्तिष्क से, मानवीय भावों को ख़त्म कर देती हैं यदि आपको नहीं पता कि डोपामीन क्या होता है, तो नीचे दिए गए लिंक पर Click करें और जानें,

Benefits

Spiritual development benefits | आध्यात्मिक विकास के लाभ

बार बार कृष्ण द्वारा, आपकी आत्मा को जाग्रत करने का, यही अभिप्राय: है, यही Benefit है, कि आप इन दोषों से दूर रहो, स्वयं को सामान्य समझोगे, तब ही इन क्रोध लोभ मोह अहम् जैसे दोषों से निजात पा पाओगे, इन अवगुणों से निजात पाने के बाद, जीवन अपने उच्च शिखर पर पहुँच जाएगा, आपकी स्थिति मैं ठहराव आ जायेगा, भूत भविष्य की चिंताओं से मुक्त, अक्षम्य आनंद की अनुभूति होगी, सदा खुश रहोगे,

एक सत्य – जब आप अपने, स्वार्थी विचारों से मुक्त हो जाओगे, तब बड़ी आसानी से, दूसरों का व्यक्तित्व समझने / दूसरों के विचारों को पढ़ने मैं निपुण हो जाओगे, सत्य के स्पष्ट दर्शन होंगे, व्यक्ति की जुबान से ज्यादा उसकी भावनाओं की आवाज सुनाई देगी, हम समझते हैं, कि Spiritual development (आध्यात्मिक विकास ) साधुओं के लिए जरुरी है, यही हमारी गलतफहमी है, जो साधू समाज के कर्तव्यों, अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त है, उसे आध्यात्मिक विकास की इतनी जरुरत नहीं, जितनी जरुरत एक गृहस्थ मनुष्य को है,

Necessary

जीवन मैं, आध्यात्मिक विकास (Spiritual development ) क्योँ जरुरी है ?

बार बार कृष्ण द्वारा, आपकी आत्मा को जाग्रत करने का, यही अभिप्राय: है, यही Benefit है, कि आप इन दोषों से दूर रहो, स्वयं को सामान्य समझोगे, तब ही इन क्रोध लोभ मोह अहम् जैसे दोषों से निजात पा पाओगे, इन अवगुणों से निजात पाने के बाद, जीवन अपने उच्च शिखर पर पहुँच जाएगा, आपकी स्थिति मैं ठहराव आ जायेगा, भूत भविष्य की चिंताओं से मुक्त, अक्षम्य आनंद की अनुभूति होगी, सदा खुश रहोगे, नवजात शिशु की भाँति जितनी कम यादें होंगी, जीवन मैं दुखों का प्रभाव उतना कम होगा

एक सत्य – जब आप अपने, स्वार्थी विचारों से मुक्त हो जाओगे, तब बड़ी आसानी से, दूसरों का व्यक्तित्व समझने / दूसरों के विचारों को पढ़ने मैं निपुण हो जाओगे, सत्य के स्पष्ट दर्शन होंगे, व्यक्ति की जुबान से ज्यादा उसकी भावनाओं की आवाज सुनाई देगी, हम समझते हैं, कि Spiritual development (आध्यात्मिक विकास ) साधुओं के लिए जरुरी है, यही हमारी गलतफहमी है, जो साधू समाज के कर्तव्यों, अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त है, उसे आध्यात्मिक विकास की इतनी जरुरत नहीं, जितनी जरुरत एक गृहस्थ मनुष्य को है,

Effect

जीवन मैं Spiritual development (आध्यात्मिक विकास) का क्या प्रभाव पड़ता है ?

जीवन की अलग अलग अवस्था मै, भिन्न भिन्न अनुभव / निर्णय लेने की जरुरत / व्यापारिक सामाजिक या पारिवारिक कर्तव्यों का निर्वाह / अच्छाई – बुराई का स्पष्ट अवलोकन, मीठे का त्याग और कड़वे का पान,,, ये सभी जरूरतें एक गृहस्थ मनुष्य के Spiritual development (आध्यात्मिक विकास) से, उसके निर्णयों को प्रभावित करती हैं,

व्यक्ति मैं जितनी अधिक आत्मीयता होगी, उसका संसार के झूठे मापदंडों के प्रति, कम झुकाव होगा, लोभ अहम् जैसी भावनाएं नहीं होंगी, इससे वो कभी उत्तजित होकर निर्णय नहीं लेगा, उसके दिमाग मैं, स्वयं को श्रेष्ठ समझने जैसा अज्ञान नहीं पनपेगा, और न ही दूसरों को तुच्छ समझने जैसी हीनभावना,
आजकल लोगों मैं धन के प्रति झुकाव, इतना ज्यादा है, कि वे सिर्फ धनवान व्यक्ति को ही, सम्मान के योग्य समझते हैं, जबकि धन तो विरासत मैं भी मिल जाता है, पर ज्ञान स्वयं के प्रयासों से प्राप्त होता है, एक ज्ञानी पुरुष आपको, बड़ी आसानी से, धन कमाने का जरिया तो बता सकता है, पर एक धनी सेठ से, ज्ञान प्राप्त हो, जीवन मैं संतुष्टि आये, ऐसी सम्भावनायें बहुत कम हैं

Analysis

आध्यात्मिक विकास (Spiritual development ) पर अंतिम विश्लेषण ?

तर्क जीवन मैं, असंतुष्टि और तनाव पैदा करते हैं, जबकि अध्यात्म आपको संतुष्ट और संवेदनशील बनाता है, जब Spiritual development जरिये, स्वयं को जानने का प्रयास करेंगे, अपने जीवन के साथ खुद तर्क-भेद करेंगे, तो जानेंगे कि , “धन” जीवन का सर्वोपरि लक्ष्य नहीं है, जब व्यक्ति धन के पीछे भागते भागते थक जाता है, स्वनिरीक्षण करता है, और जानने का प्रयास करता है, कि वह धन के पीछे क्यों भाग रहा था ? तो उसे उत्तर प्राप्त होता है – कि सम्मान, वह अधिक धन कमाकर सम्मान पाना चाहता था, परन्तु सोचने वाली बात है, क्या आप अपने ऐसे पडोसी को, कभी सम्मान देना चाहोगे, जिसके पास “धन” तो बहुत हो , पर व्यवहार कुशलता न हो ? शायद कभी नहीं, उसका धन सिर्फ उसकी विलसिताएं पूरी करेगा, आपकी नहीं

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परन्तु उसका सदव्यवहार पूरे संसार को संतृप्त करेगा, परन्तु ये बात, उसके तब समझ मैं आती है, जब उसका शरीर और दिमाग थक चुके होते हैं, अब सम्मान के लिए उतनी भाग दौड़ नहीं कर सकता,, कितना अच्छा होता, कि वह मूर्ख व्यक्ति जीवन के लिए धन कमाता, और अमरत्व के लिए सम्मान
अफ़सोस पूरी जिंदगी की मेहनत, छोड़ के जाना पड़ेगा, ये विचार चैन से मरने भी नहीं देता
इस उदाहरण से आप समझ गए होंगे, कि जीवन मैं, आध्यात्मिक विकास (Spiritual development ) कितना जरुरी है, इस लेख को पढ़ने के बाद, आपके भीतर, स्वतः 50% आध्यात्मिक विकास हो जायेगा,,

बाकी के 50% आध्यात्मिक विकास के लिए, आपको अपने दिमाग के, मन (Internal Storage ) वाले हिस्से से, अपने स्वार्थी को नियंत्रित करना पड़ेगा, निरंतर बनते विचारों की इसी प्रक्रिया से निजात पा लेने को, मुक्ति कहते हैं, इसके लिए प्रत्येक दिन 10 मिनट ध्यान करना चाहिए, मगर हमें आजतक, किसी ने यही नहीं बताया, कि “ध्यांन” करते कैसे हैं, आँख बंद करके बैठ जाने से, ध्यान नहीं होता, ध्यान की सही प्रक्रिया जानने ले लिए, नीचे लिंक पर Click करें

Spiritual development पर अंतिम विश्लेषण

दरअसल अध्यात्म एक विज्ञान है, मनोविज्ञान, जिसके द्वारा व्यक्ति, अपनी भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को समझकर, उनपर नियंत्रिण कर पाने मैं, सफल होता है, मानव जीवन मैं, ये अब तक का सबसे सफल प्रयोग है, इसका विपरीत रूपांतरण है, कानून
यदि आप लेखक की शैली मैं समझें तो कानून – एक ऐसा विधान है, जिसका प्रयोग भी, मनुष्य की भावनाओं पर अंकुश रखने के लिए , के लिए किया जाता है, जिसके हर प्रकरण मैं अलग अलग वाक्य जे द्वारा, यही समझाने का प्रयास होता है, कि ऐसा न करो, उदाहरण
चोरी करने पर – आईपीसी धारा 378
क़त्ल करने पर – धारा 302
धोखाधड़ी पर – आईपीसी की धारा 420
इन धाराओं के तहत, सजा का प्रावधान है, अर्थात हर धारा का तात्पर्य है, ऐसा नं करो, परन्तु कलयुग मैं व्यक्ति का तार्किक दिमाग, उसी काम को अन्य दूसरे तरीके से करने का प्रयास करता है, जब तक वो नया तरीका, संविधान मैं नहीं है, उस पर कोई आपत्ति नहीं, कोई धारा नहीं, जब इस तरह के मामले सरकार की देखरेख मैं आते हैं, तब उसे रोकने के लिए कानून मैं संसोधन किया जाता है, परन्तु तार्किक युग मैं, कानून बार बार इसी तरह fail होता रहेगा, क्योंकि तार्किक दिमाग, उसी काम को करने के नए नए तरीके ईजाद करता रहेगा
परन्तु अध्यात्म बिलकुल इसके विपरीत है, अध्यात्म मैं, व्यक्ति को जीवन जीने के, सिर्फ चुनिंदा मार्ग ही,,दिखाए जाते हैं, जिस पर अमल किया जाए, व्यक्ति के दिमागन को, आदेश की मुद्रा मैं, ये कहा जाता है, कि जो अध्यात्म ने बताया है, सिर्फ इसे करो, वो भी निपुणता से, इससे व्यक्ति के दिमाग को, विकल्प ख़त्म करने आदेश दिए जाते हैं उदाहरण, जैसे
जीवन मैं प्रेम / सत्य / अहिंसा का मार्ग अपनाओ, इसके आगे कोई विकल्प नहीं, तो जीवन से तर्क समाप्त हो जाते हैं,
वैसे सत्य की परकाष्ठा के लिए, तर्क भी जरुरी हैं, पर अध्यात्म, इन तर्कों को, विपरीत परिस्थिति मैं उपयोग मैं लाने की बात करता है, अध्यात्म जीवन को तर्क / विचारों से ऊपर रखता है
जबकि कानून मैं, तर्कों / विचारों को जीवन से अधिक महत्त्वपूर्णता दी जाती है,
इसलिए व्यक्ति को आध्यात्मिक बनना जरुरी है, यदि वह अध्यात्मक होगा, तो स्वयं की सुविधा से अधिक, दूसरों की असुविधा का ध्यान रखेगा, अपने जीवन मैं, शालीनता और संवेदनशीलता बरतेगा, और जो व्यक्ति संवेदनशील होगा, वो कभी कोई गैरकानूनी काम ही नहीं करेगा, मेरा मानना है, कि प्रत्येक माता पिता को, अपने अपने बच्चों को, आध्यात्मिक ज्ञान अवश्य देना चाहिए, ताकि वे कभी कानून का उलंघन न करें

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