यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्ध, र्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे

अर्थ : भगवान् श्री कृष्ण, अर्जुन से कह रहे हैं, हे अर्जुन Yada Yada Hi Dharmasya… – जब जब इस धरती पर, धर्म की हानि होती है, एवं अधर्म मैं वृद्धि होती है, तब तब साधुओं की, (अच्छे लोगों की) रक्षा करने के लिए , दुष्टों का संहार करने के लिए, और धर्म की पुनर्स्थापना करने के लिए, “मैं” इस पृथ्वी पर जन्म लेता हूँ

सामान्य जीवन की तरह यदि यहाँ तर्क प्रयोग करें : Yada Yada hi dharmasya

गौर से ,समझने वाली बात ये है, कि जिस व्यक्ति ने, पूरे युद्द के दौरान, अपने हाथों से शस्त्र न उठाने का वचन लिया हो, वो इस युद्द मैं, किसी के संहार की बात कैसे कर सकता है ??? जब मैं यहाँ तर्क करूँगा तो आप कहोगे कि, कृष्ण तो भगवान् थे, मैं भी मानता हूँ, कृष्ण भगवान् ही थे, तो युद्द के दौरान, उनके जो भक्त मारे गए, उनका क्या ?उन्होंने अपने चुनिंदा भक्तों, यहाँ तक कि अपने प्रिय भांजे (अभिमन्यु ) को क्यों नहीं बचाया

कुछ तर्क ऐसे होते हैं, कि जीवन से, आस्था को समाप्त कर देते हैं, परन्तु यदि वह आस्था झूठी है, आडम्बर है, तो समाप्त होनी ही चाहिए, और ध्यान रखें, अगर आस्था सच्ची है, तो हमेशा बढ़ती जायेगी, कभी समाप्त नहीं होगी,

मेरे एक अध्यापक हैं, (B. N. Dixit), जिन्होंने मुझे Class 8th तक शिक्षा दी, बचपन मैं ही, जीवन के विभिन्न मापदंडों का अनुभव करवाया, तन मन और धन से, बहुत सहयोग किया, उनके प्रति मेरी आस्था है, सबसे पहले उन्होंने ही, राम और कृष्ण के जीवन का सार समझाया, मेरी माँ ने, मेरे पालन पोषण के लिए, अपने जीवन के ढेरों बलिदान दिए, अर्थात मेरी माँ, मेरे अध्यापक, राम या कृष्ण के जीवन मार्ग,,,,, इन सब के प्रति मेरी आस्था है, ये कभी कम नहीं होगी, जब तक मैं स्वार्थ या अज्ञान मैं, न डूबूं,

Dwapar yuga

Yada Yada Hi Dharmasya… सुनकर लोग आकर्षित क्यों नहीं होते ?

पर आजकल हम सभी, स्वार्थ और अज्ञान मैं डूबे हैं, इसलिए राम और कृष्ण के चमत्कारों भरी कहानियां सुनकर प्रभावित तो होते हैं, परन्तु वो हमारी इक्षायें पूरी नहीं करते इसलिए, ये आस्था कमजोर और झूठी प्रतीत होती है, बाहर से हम कितना भी दिखावा करें, अंदर से, ये खोखली आस्था है,,,अनेक लोग, भगवान् की पूजा भी इसलिए करते हैं, उन्हें शीश झुकाते हैं, क्योंकि भीतर डर है, कि ये सर्वशक्तिमान भगवान् हैं, कुछ भी कर सकते हैं, अगर हमने इनका सम्मान नहीं किया तो, क्रोध मैं आकर ये हमारा बुरा न कर दें, जबकि वे लोग जो अलग अलग सम्प्रदाय से हैं, वे भी अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं, यहाँ तक की, सैकड़ों प्रकार के कीट, भी अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं, बिना किसी भय के,,,,तो हमारे मन मैं, ईश्वर के प्रति इतना भय क्यों, वैसे तो ये डर अच्छा है, ढोंगी आस्तिक लोगों मैं, ये डर बना रहना चाहिए, परन्तु सद्पुरुषों मैं ऐसे डर का होना, स्वाभाविक नहीं

Yada Yada Hi Dharmasya

चलिए हम अपने Point पर आते हैं : Yada Yada Hi Dharmasya….

यहाँ अर्जुन का अर्थ है, अनुराग, अर्थात स्नेही, लगाव रखने वाला, विस्तार मैं कहें follower, अमल करने वाला,,,,और कृष्ण का अर्थ है – मैं,,,, मैं यानि अकेले कृष्ण नहीं, क्योंकि कृष्ण ने गीता मैं स्वयं कहा है कि,, वह किसी मनुष्य या जीव को, उसकी शरीरिक बनावट या सौंदर्य, के रूप मैं नहीं जानते, जीव का कर्म ही, उसकी वास्तविक पहचान है, अपनी बुद्धि के स्वाद द्वारा, सभी जीव भिन्न भिन्न प्रकार से, जीवन यापन करते हैं, परन्तु सभी मैं, एक ही आत्मा (अर्थात जीवन दायिनी ऊर्जा ) का वास है,,, क्योंकि वे स्वयं आत्मज्ञानी है, आत्म्गुणी हैं, इसीलिए सभी जीवों, मनुष्यों को भी, आत्मा के रूप मैं, देखते हैं, यदि आप भी आत्मा का वास्तविक स्वरूप जानना चाहते हैं, वैज्ञानिक शोधकर्ताओं द्वारा अनुभव करना चाहते हैं, तो नीचे दिए लिंक पर Click करें

तो अर्जुन यानी कि, अच्छी बातों पर, अमल करने वाला और कृष्ण, यानि कि व्यक्ति की आत्मा

अब समझो – शरीर धारण करने वाली, प्रत्येक बुद्धि से,, आत्मा कह रही है Yada Yada Hi Dharmasya…..
हे अनुरागी ( Follower ) – जब जब इस धरती पर, धर्म की हानि होती है, एवं अधर्म मैं वृद्धि होती है, अच्छे लोगों की रक्षा करने के लिए, दुष्टों प्रवत्ति के लोगों का, संहार करने के लिए, और धर्म की पुनर्स्थापना करने के लिए, “मैं” (यानी आत्मा )इस पृथ्वी पर जन्म लेते हैं

यानि कि ये शब्द कृष्ण ने अपने लिए नहीं, पृथ्वी पर सभी मनुष्य जातियों के लिए कहा है, चाहे स्त्री हो या पुरुष,,, कि जिस जिस व्यक्ति मैं, सत्य और न्याय के प्रति आस्था का भाव उत्पन्न होगा, वो प्रत्येक व्यक्ति अधर्म के प्रति,, खड़ा हो जायेगा, अर्जुन की तरह

ताज्जुब वाली बात ये हैं, कि Yada Yada Hi Dharmasya.. श्लोक मैं, कहीं “मैं” का प्रयोग ही नहीं हुआ, क्योंकि वो सर्व मानव जाति के लिए है, पर हमें जो विशेष पाठ पढ़ाया गया है,,,,उसमें कृष्ण, सिर्फ स्वयं ही, सभी पापियों का नाश करने की बात कर रहे हैं,, उन धर्मगुरुओं की भी कोई गलती नहीं, आप और हम पर, न तो इतना समय है, न ही इतनी आस्था, कि हर एक ज्ञानी मनुष्य, अन्याय के विरुद्ध खड़ा हो सके, या अपनी अपनी संतानों को, अन्याय के विरुद्ध खड़ा होने का, पाठ पढ़ा सके,,

बल्की हमने तो समझा है, जहाँ कहीं न्याय या अन्याय की बात हो, ऐसी जगह से, चुपचाप निकल जाओ, इसी को हम बुद्धिमानी समझते हैं, परन्तु कृष्ण के बताये मार्गों के अनुसार, कहीं भी अन्याय की बात हो रही हो, वहां अपनी टाँग अड़ा दें, अशुद्ध हो चुकी परम्पराओं को तोड़ दें, अपने एक हाथ मैं, बांसुरी और दूसरे हाथ मैं चक्र धारण करने का, अभिप्राय है, कि अच्छे के लिए प्रेम, और ख़राब के लिए दंड, का प्रावधान रखें, यही प्रत्येक ज्ञानी मनुष्य का कर्तव्य है,

Yada Yada Hi Dharmasya…आज का अर्थ

पर हमने कभी ऐसा नहीं सोचा, न हमें बताया गया
100 बर्ष पहले तक, भारत के सभी अभिभावक,,अपनी अपनी संतानों को, अन्याय के विरूद्ध खड़े होने का मार्ग बताते थे, तभी लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान पर, हमारे आजादी की नीँव टिकी है, कृष्ण ने नहीं, कृष्ण के बताये जीवन मार्गों ने, देश को आजाद करवाया,

हम सभी के विचार इतने तुच्छ हो गए हैं, कि राम या कृष्ण के बताये, जीवन मार्गों से तो, बिलकुल अनभिज्ञ हैं, परन्तु जो लोग इनका नाम रटते हैं, वो भी इसलिए, कि उनमें से कुछ लोग भयभीत हैं, कि यदि कृष्ण।/ राम का, नाम नहीं रटा, तो कुछ बुरा हो जाएगा, या कुछ लोगों को, उम्मीद है, कि नाम रटने से, कुछ अच्छा हो जायेगा,
परन्तु , न तो कोई, कृष्ण की वास्तविक महत्ता जानने को तैयार है, न ही कोई, कृष्ण का अनुरागी है

अर्जुन अनुरागी था, तो न्याय के प्रति , अपने सम्बन्धियों के विरूद्ध, युद्ध लड़ने को खड़ा हो गया, अर्जुन का ये युद्ध, राज्य के प्रति उसकी लालसा नहीं थी, बल्कि अन्याय का दमन करके, भविष्य के लिए, शांति की स्थापना करना था,
सैकड़ों बर्षों की परम्पराओं को निभाने से, व्यक्ति मोह अहम् के शिकार हो जाते हैं,, लोभ और इक्षाएं व्यक्ति मैं, हिंसा को जन्म देती हैं, तर्क द्वारा ऐसे व्यक्ति, अपनी स्वार्थी भावनाओं को सिद्ध करते हैं, ये भी इतना अनुचित नहीं है, जितना अनुचित है, ज्ञानियों और सद्पुरषों का मौन, अन्याय देखकर जो व्यक्ति, पतली गली से निकल जाते हैं, दरअसल ऐसे लोग ही अन्याय को बढ़ावा देते हैं,

इसलिए भाइयो और बहिनो, अपनी – अपनी — मैं
अर्थात आत्मा को जाग्रत करो, यदि हम एकता के भाव मैं, सभी लोगों को, एक साथ जोड़कर – मैं,,,,, का उच्चारण करेंगे, तो आपकी शक्ति कहलाएगी, परन्तु जब आप अकेले – मैं,,,,, का उच्चारण करोगे, तो ये आपकी कमजोरी, आपका अहम् बन जायेगे
इसलिए मैं फिर से, आपको एहसास दिलाना चाहता हूँ, कृष्ण का इन्तजार मत करो, खुद अन्याय के विरूद्ध, लड़ने को सजग हो जाओ, जब मृत्यु किसी के हाथ की बात ही नहीं तो भय कैसा, जीवन लम्बा नहीं, बड़ा होना चाहिए, यहाँ Yada Yada Hi Dharmasya श्लोक का, यही एक मात्र अर्थ है

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